भ्रम में जीते हैं लोग, मानते हैं खुद को बड़ा दानी, जबकि देने वाला तो कोई और ही है

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ज्योतिषाचार्य आशुतोष वार्ष्णेय |

’’देनहार कोऊ और है!’’ अर्थात् देने वाला कोई और है, हम किसी को कुछ दे नहीं सकते हैं, केवल चीजों को हस्तांतरित करते हैं। रहीम खानखाना का दान देने का अपना ही एक अनोखा अंदाज़ था। रहीम जब भी किसी को दान देते, तो अपनी आँखें नीची रखते और कभी भी लोगों से आँखें नहीं मिलाते थे।
ज्ञानियों की मानें तो – इस संसार में देनहार ईश्वर के अलावा कोई भी नहीं है। जब मनुष्य के पास कुछ है ही नहीं तो फिर देने की बात ही बेमतलब है। जो धन-सम्पति मनुष्य के पास उपलब्ध है, उसे मनुष्य समझ लेता है कि वह उसका है, यह सबसे बड़ा भ्रम है।
हम देने वाले कैसे – जो कुछ भी हमारे पास है, वह किसी और का दिया हुआ है, तो फिर जब हमारे द्वारा किसी और के पास वह वस्तु हस्तांतरित होती है तो हम देने वाले कैसे हो सकते हैं।
 
एक प्रेरक प्रसंग – रहीम खानखाना का नियम था, कि वे प्रतिदिन गरीब याचकों को दान देते थे और देते समय वह कभी अपनी नज़र दान लेने वाले पर नहीं डालते थे। वह नज़र नीचे करके रूपए-पैसों के ढेर से मुट्ठी भरकर गरीबों को देते थे। अपने नियम अनुसार एक दिन जब वह गरीबों को दान दे रहे थे तो उनसे किसी ने पूछा, ‘जैसे-जैसे आपका हाथ दान देने के लिए उठ रहा है, आपके नैन नीचे क्यों झुकते जा रहे हैं? तुम ऐसे दान क्यों देते हो? ऐसा तुमने कहां से सीखा?’
ऐसी देनी देन जू कित सीखे हो सैन। ज्यों-ज्यों कर ऊँचे करो, त्यों-त्यों नीचे नैन।।
इस पर रहीम ने दोहे के रूप में इसका उत्तर दिया,
 
‘देनहार कोउ और है, भेजत सो दिन रैन। लोग भरम हम पै धरैं, याते नीचे नैन’
देने वाला तो कोई और ही है, जो दिन-रात दे रहा है, लेकिन लोग समझते हैं कि मैं दे रहा हूं, इसलिये मेरी आंखें अनायास ही शर्म से झुक जाती हैं। मनुष्य कहां किसी को कुछ दे सकता है, देने वाला तो दूसरा ही है, जो दिन-रात भेजता रहता है, इन हाथों से दिलवाने के लिए। लोगों को व्यर्थ ही भ्रम हो गया है कि रहीम दान देता है। मेरे नेत्र इसलिए नीचे को झुके रहते हैं कि मांगने वाले को यह भान न हो कि उसे कौन दे रहा है, और दान लेकर उसे दीनता का एहसास न हो। कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि पहले प्रश्न वाला दोहा गोस्वामी तुलसीदास का है, वहीं कुछ लोग इसे कवि गंग का मानते हैं। लेकिन प्रश्न चाहे किसी ने भी किया हो, महत्वपूर्ण बात तो रहीम के उत्तर में निहित है, कि दान देते समय या किसी की मदद करते समय हमारे मन में अभिमान नहीं बल्कि नम्रता का भाव होना चाहिए।
 

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