रायपुर। मानवविज्ञान अध्ययनशाला, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर के द्वारा विश्व मानवविज्ञान दिवस के पूर्व संध्या पर दिनांक 19 फरवरी 2025 को छत्तीगसढ़ की पारंपरिक लोक जनजातीय चित्रांकन शैलियाँ विषय पर छत्तीगसढ़ के सुप्रसिद्ध संस्कृतिविद्, पूर्व संग्रहालय अध्यक्ष, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालयाध्यक्ष, भोपाल एवं प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस, सी.वी. रमन विश्वविद्यालय, कोटा, बिलासपुर श्री अशोक तिवारी जी के द्वारा विशेष व्याख्यान प्रस्तुत किया गया। इस व्याख्यान कार्यक्रम के प्रारंभ में स्वागत भाषण प्रस्तुत करते हुए प्रो. अशोक प्रधान ने कहा कि आज का दिन हमारे लिए मानवविज्ञान के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान देने वाले विद्वानों के कृतित्व एवं व्यक्तित्व पर न केवल विमर्श करना है बल्कि उनसे प्रेरणा प्राप्त कर मानववैज्ञानिक अनुसंधान एवं अध्ययन को आगे बढ़ाना है। इसी कड़ी में मानवविज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष, प्रो. जितेन्द्र कुमार प्रेमी ने आयोजन के उद्देश्य एवं महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि इस वर्ष विश्व मानवविज्ञान दिवस का विषयवस्तु द फ्यूचर एण्ड इट्स डिक्लाईनेशन्स" रखा गया है। जिसका अर्थ यह है कि जिस प्रकार से मानव समाज का भविष्य भौतिक उपलब्धियों से भरा पड़ा है और दिनों-दिन विकास के नए सोपानों को लाँघ रहा है, किन्तु साथ ही मानवीय मूल्यों एवं मानवीय चरित्रों में लगातार हास हो रहा है। विवाह और परिवार जैरी संस्थाएँ विखण्डन के कगार पर हैं। सामुदायिक एवं नस्लीय विभेद एवं कटूता बढ़ते जा रहा है। हर कोई दूसरों को अपने ही रंग में रंगना चाह रहा है तो वहीं दूसरी तरफ जलवायु परिवर्तन जैसी विनाशकारी परिस्थितियाँ मानवीय अस्तित्व के लिए घोर संकट उत्पन्न कर रहा है। ऐसी स्थिति में चूँकि मानवविज्ञान मानवीय समाज के संपूर्ण पक्षों का अध्ययन करता है जिसका ध्येय वाक्य है "मानवीय विभिन्नता की रक्षा"। अत: मानवविज्ञान ही ऐसा एक वैचारिक एवं अकादमिक पात्रता रखता है जिसके अनुसंधान एवं अध्ययन उपरोक्त वर्णित मानवीय संकट को न केवल टाल सकता है बल्कि समूल नष्ट भी कर सकता है।
भोपाल एवं प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस, सी.वी. रमन विवि, कोटा, बिलासपुर अशोक तिवारी जी के द्वारा विशेष व्याख्यान प्रस्तुत किया गया
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मुख्य वक्ता के रूप में श्री अशोक तिवारी ने छत्तीगसढ़ की जनजातियों एवं लोककला का गहनता एवं सूक्ष्मता के साथ विषद् वर्णन प्रस्तुत करते हुए अपने वक्तव्य की शुरूआत छत्तीसगढ़ की अतिप्राचिनतम शैलचित्रों से करते हुए टेराकोटा आर्ट, घड़वा आर्ट, आयरन आर्ट, बेल मेटल आर्ट, बेंबू आर्ट, मुरिया चित्रकला, माडिय़ा चित्रकाल, माडिय़ा मृतक स्मृति स्तंभ कला, रजवार भित्ती चित्रण कला, उराँव चित्रकला, मुरिया भित्तीसज्जा, रहस मूर्ति एवं चित्रकला, निषाद भाट चित्रांकन, सौनाही, आठे कन्हैया, चितेर विवाह चित्रकारी, जगार चित्रकला, धनकूल वाद्य कला, चउँक कला, हाथा कला, गोदना कला एवं नगमत कला इत्यादि कला पक्षों का न केवल रूपात्मक वर्णन प्रस्तुत किया, बल्कि इन कला रूपों के भौतिक एवं आध्यात्कि अर्थ, उद्देश्य एवं उनके वैज्ञानिक रहस्यों का भी विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया की छत्तीसगढ़ लोक कला कि दृष्टि से अभूतपूर्व रूप से धनी है जो कि छत्तीगसढ़ के लोगों के प्रतिदिन की जीवनचर्या में संस्कृति की तुलना में इन्हें अग्रणी बनाता है।




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