लोक जगत, रायपुर। भारत का मूल आधार उसकी विविधता और सांस्कृतिक सौहार्द में निहित है। सदियों से यहाँ विभिन्न धर्मों, जातियों और विचारों के लोग एक साथ मिलकर रहते आए हैं। यही विविधता हमारी सबसे बड़ी ताकत भी है। लेकिन पिछले कुछ समय से जिस तरह सार्वजनिक मंचों से भड़काऊ बयानबाजी और नफ़रत फैलाने का सिलसिला बढ़ा है, वह न केवल चिंताजनक है, बल्कि हमारी लोकतांत्रिक और संवैधानिक मर्यादाओं पर भी एक सीधा प्रहार है।हाल ही में काजल हिंदुस्तानी जैसे सार्वजनिक वक्ताओं द्वारा दिए गए विवादित और उत्तेजक भाषणों ने एक बार फिर इस बहस को गर्म कर दिया है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा क्या होनी चाहिए? किसी भी समाज में अपनी बात कहने का अधिकार सबको है, लेकिन जब भाषा का प्रयोग दो समुदायों के बीच वैमनस्य पैदा करने, डर फैलाने या हिंसा को उकसाने के लिए किया जाए, तो वह अभिव्यक्ति नहीं बल्कि सामाजिक शांति पर हमला बन जाती है।त्रासदी यह है कि ऐसी बयानबाजी अक्सर सुर्खियों में रहने और राजनीतिक/सामाजिक गोलबंदी हासिल करने का एक आसान ज़रिया बनती जा रही है।

सोशल मीडिया के इस दौर में एक भड़काऊ वाक्य पल भर में लाखों लोगों तक पहुँच जाता है और माहौल को ज़हरीला बना देता है। इसका सीधा असर आम जनता, रोज़मर्रा के भाईचारे और देश के कानून-व्यवस्था के तंत्र पर पड़ता है।यहाँ सबसे महत्वपूर्ण भूमिका प्रशासन और न्यायपालिका की होती है। यदि ऐसे मामलों में समय रहते निष्पक्ष और सख्त कार्रवाई न हो, तो नफ़रत फैलाने वाले तत्वों के हौसले बुलंद होते हैं। कानून का शासन तभी कायम रह सकता है जब बिना किसी भेदभाव या दबाव के संविधान का उल्लंघन करने वालों पर त्वरित कदम उठाए जाएँ।एक परिपक्व समाज के रूप में हमारी भी जिम्मेदारी बनती है कि हम ऐसी ताकतों के बहकावे में आने से बचें जो हमें बांटने का प्रयास करती हैं। उत्तेजना का जवाब शांति और नफ़रत का जवाब संयम से देना ही हमारी सबसे बड़ी शक्ति है। वक्त की माँग है कि नफ़रत की इस राजनीति के खिलाफ नागरिक समाज, मीडिया और प्रशासन एक सुर में खड़े हों, ताकि हमारी साझा विरासत और सामाजिक सौहार्द को सुरक्षित रखा जा सके।







Leave a Reply