लोक जगत, नई दिल्ली। संभल (उत्तर प्रदेश) के व्यापारी और प्रॉपर्टी डीलर मुल्ला अफ़रोज़ को राहत देते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने उनके ख़िलाफ़ जारी राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत प्रिवेंटिव डिटेंशन (निवारक नज़रबंदी) के आदेश को खारिज कर दिया है। इसके साथ ही, शीर्ष अदालत ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस फैसले को भी निरस्त कर दिया, जिसने इस हिरासत को सही ठहराया था। अदालत ने राज्य सरकार के रवैये पर कड़ी टिप्पणी करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है।

क्या था पूरा मामला?
नवंबर 2024 में संभल स्थित शाही जामा मस्जिद के अदालती सर्वेक्षण के दौरान हुई हिंसा से यह मामला जुड़ा है। इस झड़प और गोलीबारी में चार लोगों की जान चली गई थी। घटना के लगभग दो महीने बाद, जनवरी 2025 में पुलिस ने अफ़रोज़ को गिरफ़्तार किया था।
जब अफ़रोज़ को संबंधित आपराधिक मामलों में ज़मानत मिलने लगी, तो संभल के ज़िला मजिस्ट्रेट ने 13 अक्टूबर 2025 को उन पर एनएसए के तहत एक वर्ष की प्रिवेंटिव डिटेंशन लागू कर दी। अफ़रोज़ ने इस कार्रवाई को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, लेकिन जून 2026 में हाईकोर्ट ने याचिका यह कहकर खारिज कर दी कि प्रशासन का निर्णय पर्याप्त आधारों पर आधारित था।
सुप्रीम कोर्ट की तल्ख़ टिप्पणियाँ
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान पुलिसिया कार्रवाई और प्रक्रियाओं पर गंभीर सवाल खड़े किए:
0 पुलिस के समक्ष बयान की वैधता: अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल पुलिस हिरासत में दिए गए इक़बालिया बयान (कन्फ़ेशन) के आधार पर प्रिवेंटिव डिटेंशन जैसा कठोर कदम नहीं उठाया जा सकता, जब तक कि उसका समर्थन करने वाले कोई स्वतंत्र साक्ष्य न हों। अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 20(3) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 23 का संदर्भ दिया, जो जबरन आत्म-दोषारोपण से सुरक्षा प्रदान करते हैं।
0 साक्ष्यों की अनुपलब्धता: पुलिस ने अफ़रोज़ को मुख्य आरोपी बताने के लिए जिन सीसीटीवी फुटेज और वीडियो का हवाला दिया था, वे न तो आरोपी को सौंपे गए और ना ही अदालत के समक्ष प्रस्तुत किए गए।
0 ‘प्रक्रिया ही बनी सज़ा’: बेंच ने टिप्पणी की कि ज़मानत के प्रभाव को बेअसर करने के लिए इस असाधारण कानून का इस्तेमाल किया गया। अफ़रोज़ को अपनी एक साल की हिरासत की लगभग पूरी अवधि जेल में बितानी पड़ी, जो कि निवारक कम और दंडात्मक ज़्यादा साबित हुई। अदालत ने कहा कि इस मामले में “प्रक्रिया ही अपने आप में एक सज़ा बन गई।”
मुआवजा और आगे की राह
अफ़रोज़ को बाकी सभी मामलों में पहले ही ज़मानत मिल चुकी थी, लेकिन एनएसए के तहत नज़रबंदी के कारण उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता एक साल तक बाधित रही। इसकी भरपाई के रूप में सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार को 10 लाख रुपये का जुर्माना अदा करने का निर्देश दिया।
फैसले के बाद अफ़रोज़ के अधिवक्ता दिव्येश प्रताप सिंह ने संतोष व्यक्त करते हुए कहा कि अदालत के इस निर्णय ने साबित कर दिया है कि प्रिवेंटिव डिटेंशन का आदेश बेबुनियाद और कमजोर आधारों पर आधारित था।








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