लोक जगत, नई दिल्ली। आंदोलित युवाओं से संवाद करने और समस्याओं का समाधान खोजने के बजाय सरकारी तंत्र सख्ती को ही रास्ता मान लेता है। कानून-व्यवस्था बनाए रखना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन हर असहमति को संदेह की नजर से देखना लोकतंत्र के लिए स्वस्थ संकेत नहीं। विरोध और अराजकता एक नहीं हैं। लोकतंत्र में असहमति अवांछित शोर नहीं, बल्कि उसकी जीवंतता का प्रमाण है। ऐसे में जब देश के विभिन्न हिस्सों में युवा शिक्षा, रोजगार, अवसर और अधिकारों से जुड़े सवालों को लेकर सड़कों पर उतरते हैं, तो सबसे पहले उनके सवालों को सुनने की जरूरत है। पढ़ाई और करिअर बनाने की उम्र में एक समूची पीढ़ी अपनी ऊर्जा आंदोलन में लगाने को विवश हो, तो यह केवल उसकी बेचैनी नहीं, बल्कि व्यवस्था के लिए भी आत्ममंथन का विषय होना चाहिए। विडंबना यह है कि आंदोलित युवाओं से संवाद करने और समस्याओं का समाधान खोजने के बजाय सरकारी तंत्र सख्ती को ही रास्ता मान लेता है। कानून-व्यवस्था बनाए रखना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन हर असहमति को संदेह की नजर से देखना लोकतंत्र के लिए स्वस्थ संकेत नहीं। विरोध और अराजकता एक नहीं हैं। सवाल उठाना व्यवस्था को चुनौती देना नहीं है। जब शासन नागरिकों के सवालों का उत्तर तर्क और संवाद के बजाय शक्ति से देने लगे, तो लोकतंत्र आदेश की भाषा में बदलने लगता है। हालांकि लोकतंत्र की ताकत कठोरता में नहीं, आलोचना सुनने और अपनी नीतियों की समीक्षा करने की क्षमता में होती है।

युवाओं के आंदोलनों को भीड़ और नारों के रूप में देखना आसान है, जबकि कठिन काम यह समझना है कि आखिर ऐसी कौन-सी परिस्थितियां हैं, जो भविष्य बनाने की उम्र में उन्हें सड़क पर आने को विवश करती हैं। उनके सवालों में अगर व्यवस्था की कमी दिखती है, तो उसे दबाने के बजाय खामी को दूर करना चाहिए। अफसोस की बात यह है कि देश के अलग-अलग हिस्सों और खासतौर पर दिल्ली में युवाओं के आंदोलन के प्रति पुलिस का जैसा रवैया देखा जा रहा है, वह नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों और लोकतंत्र के लिए चिंताजनक है।







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