प्रकृति वंदन सर्वोत्कृष्ट पुण्यात्म कर्म – द्विवेदी

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राजनांदगांव : हमारी गौरवशाली सनातन संस्कृति में सदा सर्वदा काल से धरती प्रकृति के वंदन – पूजन की अनुपम अद्भूत परम्परा को मानव का सर्वोत्कृष्ट पुण्यात्म कर्म बताते हुए नगर के पर्याविज्ञ प्राध्यापक कृष्ण कुमार द्विवेदी ने समसामयिक परिप्रेक्ष्य में आह्वान किया कि जन – जन सर्वजन को उक्त पुण्यात्म कर्म दायित्व का निर्वहन अवश्य करना चाहिये। हमारे सद्ग्रन्ाि वेद, पुराण, उपनिषद, रामायण एवं महाभारत आदि सभी धरा को माता स्वरूप मानकर समस्त प्रकृति की नित्य वंदन  पूजन की महत्ता का ही अभिप्रमाणन करते है। वैसे भी समस्त प्रकृति तत्व एवं संसाधन ही प्रत्यक्ष रूप से जन-जन, जीव जंतुओं का भरण पोषण संरक्षण करते है। उल्लेखनीय है कि हमारे सांस्कृतिक दर्शन की आधार शिला प्राचीन समय से ही ऋषियों मुनियों, तपस्वियों ने नित्य दिनचर्या का प्रारंभ प्रकृति वंदन से करना तथा दिनचर्या ने नित्य दिनचर्या का प्रारंभ प्रकृति वंदन से करना तथा दिनचर्या का समापन संख्या पर तुलसी केला, पीपल, बरगद वृक्षों के पूजन वंदन से होता बताया है। आगे प्राध्यापक द्विवेदी ने विशेष रूप से बताया कि मानव जीवन की सुख समृद्धि, मूल रूप से प्रकृति तत्वों की पवित्रता पावनता तथा उनके उत्पादों की शुद्धता से होती है और प्रकृति वंदन-पूजन द्वारा ही पर्यातत्वों एवं प्रकृति संसाधनों का संरक्षण संवर्धन किया जा सकता है। युवा, किशोर, प्रौए़ पीढी को चाहिये कि अपनी जीवन शैली में प्रकृति वंदन – पूजन कार्य को अनिवार्यता से सम्मिलित करते हुए हमारे प्रकृति स्त्रोतों नदी, झील, झरनों, पर्वतों, वनों, सागरों सहित धरती – आकाश को प्रदूषण मुक्त रखें। फल-फूलों, हरियाली वाले वृक्षों का सतत विस्तार करते हुए प्रकृति वंदन के सत्य सार्थक मर्म को साकार करें। इसीलिये सनातन काल से देश – प्रदेश में तुलसी, पीपल, केला, बरगद, नीम, आंवला, आम सहित सैकड़ों वृक्षों का विशिष्ट दिवसों, पर्व, उत्सवों पर पूजन होता आया है इनके वंदन से ही वास्तविकता में घर-आंगन में शुभ मंगल होता है। आइये चर्तुदिक फैली महामारियों, आपदाओं एवं गहन समस्याओं से मुक्ति हेतु हमारी अतीव श्रेष्ठतम परम्परा प्रकृति वंदन को मनसा वाचा कर्मणा सूत्र से स्वीकार करें तथा स्वयं सर्व को खुशहाल करें। 
 

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