लोक जगत, रायपुर। सूफी संत मुजाहिद-ए-छत्तीसगढ़ के पहला सालाना उर्स का भव्य और गरिमामय आयोजन इस वर्ष अकीदत (श्रद्धा) और एहतराम (सम्मान) के साथ सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। दो दिवसीय इस उर्स मुबारक में न केवल छत्तीसगढ़, बल्कि देश के विभिन्न राज्यों से आए हजारों श्रद्धालुओं (अकीदतमंदों) ने अपनी मौजूदगी दर्ज कराई और बारगाह-ए-मुजाहिद-ए-छत्तीसगढ़ हज़रत अल्लामा मौलाना मुफ्ती मोहम्मद अली फारुकी साहब रहमतुल्लाह अलैह की दरगाह मदरसा इस्लाहुल मुस्लेमीन बैजनाथपारा में कदमबोशी कर देश व प्रदेश में अमन, चैन और भाईचारे की दुआएं मांगी।

संदल शरीफ और चादरपोशी से हुई शुरुआत…
उर्स के प्रथम दिन पारंपरिक रस्मों के साथ परचम कुशाई की रस्म अदा करते हुए उर्स का आगाज़ किया गया। रात 10 बजे से ओलमा ए केराम की तकरीर एवं नात ए पाक की महफिल सजाई गई। यह महफिल राजधानी के बैजनाथपारा स्थित मुस्लिम हॉल में सुबह के 4 बजे तक चली। कई लोगों को दीनी खिदमत के एवज़ इस मौके पर मुजाहिद ए छत्तीसगढ़ अवार्ड से भी नवाज़ा गया।
दूसरे दिन कुल शरीफ की फातेहा में भारी संख्या में लोगों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। दरूद-ए-पाक पढ़ते हुए आस्ताने पर संदल शरीफ पेश किया गया और साथ ही अकीदत के फूल और मखमली चादर पेश की गई।

दोनों ही दिन उर्स कमेटी द्वारा बाहर से आए जायरीनों (श्रद्धालुओं) के ठहरने, भोजन (लंगर) और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए व्यापक और सुदृढ़ प्रबंध किए गए थे।
गणमान्य नागरिकों व जनप्रतिनिधियों की उपस्थिति
आयोजन के दौरान क्षेत्र के प्रमुख जनप्रतिनिधियों, प्रशासनिक अधिकारियों और गणमान्य नागरिकों ने भी दरगाह शरीफ पहुँचकर चादरपोशी की और मुजाहिद-ए-छत्तीसगढ़ के प्रति अपनी अकीदत जाहिर की। वक्ताओं ने अपने संबोधन में कहा कि “सूफी-संतों की यह सरजमीं हमेशा से आपसी प्यार, सौहार्द और इंसानियत का संदेश देती रही है।”
इसके उपरांत देश में शांति, समृद्धि और भाईचारे की रक्षा के लिए सामूहिक दुआ की गई। दुआ के बाद अकीदतमंदों के बीच तबर्रुक (प्रसाद) का वितरण किया गया। उर्स कमेटी के संयोजकों ने आयोजन को निर्विघ्न और ऐतिहासिक बनाने के लिए स्थानीय प्रशासन, पुलिस विभाग और सभी सहयोगियों का तहेदिल से आभार व्यक्त किया।








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