राजनांदगांव. भारतीय सनातन संस्कृति के गौरवशाली पर्व उत्सव परंपरा को अखिल विश्व में सर्वोत्कृष्ट एवं अतीव श्रेष्ठकर निरूपित करते हुए नगर के विचार विज्ञ प्राध्यापक कृष्ण कुमार द्विवेदी ने विशेष आह्वान चिन्तन टीप में कहा कि हमारे समस्त पर्व मूलत: प्रकृति के साथ सहज अनुकूलन का ही परम पावन संदेश देते हैं। हरेली, रक्षाबंधन, जन्माष्टमी, पोला, गोविन्दा, तीजा, श्री गणेशउत्सव आदि सभी समय काल वातावरण के अनुसार रहने, खाने, पीने, ओढऩे, पहनने तथा विचरण करने का सरल मार्गदर्शन देते हुए प्रकृति प्रदत्त वृक्षावलियों के पत्तों, पुष्पों, फलों के साथ गौ द्रव्य दूध, दही, मक्खन, घी जैविक कृषि से प्राप्त जौ, तिल, उड़द, चावल, गन्ना, गुड़ से ही पूजन वंदन मिट्टी, पत्थर, धातु, मूर्तियों का करते हैं। वस्तुत: इनका प्रधान संदेश होता है कि प्रकृति के साथ चले और प्रकृति तत्वों, जल, वायु, मिट्टी, आकाश, धरती, पर्वत, वन प्रांतर को स्वच्छ सुंदर रखते हुए उनका निरंतर संरक्षण संवर्धन तभी पर्व उत्सव का आनंद एवं पूर्ण फल प्राप्त होता रहता है. आगे प्राध्यापक द्विवेदी ने स्पष्ट किया. साल दर साल पर्व को मानने का प्रमुख उद्देश्य यह भी होता है कि वर्तमान बाल, किशोर, युवा पीढ़ी इन पर्वो की महत्ता उपादेयता जीवन में सुख, समृद्धि प्राप्ति में इनकी अनिवार्यता को समझे तथा प्रकृति तत्वों के संरक्षण, संवर्धन प्रकम को भी आत्मसात कर सकें. आइये हम इन गौरवशाली पर्व, उत्सव पर्व परंपरा की मूल उद्देश्य को समझे जाने और मन प्राण से स्वीकार कर प्रकृति के साथ अनुकूलित होने का संकल्प लेवें।
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