राजनांदगांव। सनातन संस्कृति में रक्षाबंधन का पर्व न केवल एक धार्मिक उत्सव है, बल्कि यह भाई-बहन के पवित्र रिश्ते का एक गहरा भावनात्मक प्रतीक भी है। यह पर्व भारतीय सामाजिक ताने-बाने में विश्वास, स्नेह, और उत्तरदायित्व की भावना को सुदृढ़ करता है। नगर निगम के वरिष्ठ भाजपा पार्षद शिव वर्मा ने रक्षाबंधन के अवसर पर अपने विचार साझा करते हुए कहा कि यह त्यौहार न केवल पारिवारिक रिश्तों को प्रगाढ़ करता है, बल्कि सामाजिक और राष्ट्रीय स्तर पर भी एकजुटता और सुरक्षा का संदेश देता है।
श्री वर्मा ने कहा कि रक्षाबंधन केवल सगे-सहोदर भाई-बहनों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन सभी लोगों के लिए एक भावनात्मक बंधन बन जाता है जो सच्चे दिल से इस रिश्ते को स्वीकारते हैं। चाहे वह चचेरे, ममेरे, मौसेरे भाई-बहन हों या फिर मुंहबोले, यह पर्व समान रूप से अपनापन और प्रेम का प्रतीक बनकर सामने आता है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत जैसे विविधता भरे देश में रक्षाबंधन का पर्व मजहब से ऊपर उठकर मनाया जाता है। कई उदाहरण सामने आते हैं जहाँ विभिन्न धर्मों के लोग इस पर्व को समान श्रद्धा से मनाते हैं। यह दर्शाता है कि रक्षाबंधन केवल धार्मिक नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों और सामाजिक सौहार्द्र का प्रतीक है।
सामाजिक और राष्ट्रीय सुरक्षा का संदेश
शिव वर्मा ने रक्षाबंधन के व्यापक प्रभाव की चर्चा करते हुए कहा कि यह पर्व न केवल पारिवारिक संबंधों की मजबूती का प्रतीक है, बल्कि सामाजिक ताने-बाने को भी सशक्त बनाता है। रक्षाबंधन में बहन द्वारा भाई की कलाई पर राखी बांधना, भाई द्वारा उसकी रक्षा का वचन देना, यह मात्र एक रस्म नहीं बल्कि एक गहरी सांस्कृतिक भावना है जो हर नागरिक को अपने दायित्वों का स्मरण कराती है। उन्होंने कहा कि रक्षा का यह व्रत सिर्फ बहनों के लिए नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र की रक्षा के संकल्प के रूप में भी लिया जाना चाहिए। जब हर नागरिक अपने समाज और राष्ट्र की रक्षा का संकल्प ले, तभी एक समृद्ध और सुरक्षित भारत का निर्माण संभव है।
भविष्य की पीढ़ियों को सीख देने वाला पर्व
वरिष्ठ पार्षद वर्मा ने यह भी उल्लेख किया कि रक्षाबंधन नई पीढ़ियों को पारिवारिक मूल्यों, परंपराओं और सामाजिक जिम्मेदारियों की सीख देता है। यह त्योहार उन रिश्तों को संजोने की प्रेरणा देता है, जो आज की भागदौड़ भरी दुनिया में कहीं न कहीं धुंधले होते जा रहे हैं। उन्होंने सभी नागरिकों से अपील की कि वे इस पर्व को केवल एक रस्म के रूप में नहीं, बल्कि एक संस्कार और सामाजिक दायित्व के रूप में मनाएं, ताकि भाई-बहन का यह पवित्र रिश्ता समाज में प्रेम, शांति और समर्पण का संदेश देता रहे।
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